धरमजयगढ़़। वनमंडल धरमजयगढ़ के अंतर्गत आने वाले वनपरिक्षेत्र धरमजयगढ़ के ओंगना बीट में हाल ही में जंगल की आग ने एक बार फिर वन सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए। हरे-भरे जंगलों के बीच अचानक भड़की आग धू-धू कर जलती रही, मानो प्रकृति स्वयं अपनी पीड़ा व्यक्त कर रही हो। आग की लपटों और धुएँ के बीच वन्यजीवों की स्थिति का अंदाज़ा सहज ही लगाया जा सकता है—निश्चित ही अनेक जीव अपनी जान बचाने के लिए जंगल की गहराइयों की ओर भागने को मजबूर हुए होंगे।
वन विभाग द्वारा हर वर्ष वनों को आग से बचाने के लिए जागरूकता अभियान, प्रचार-प्रसार और निगरानी की बातें तो की जाती हैं, परंतु जमीनी स्तर पर इन व्यवस्थाओं की प्रभावशीलता कई बार सवालों के घेरे में दिखाई देती है। ओंगना बीट की इस घटना ने भी यही संकेत दिया कि कहीं न कहीं व्यवस्थागत कमियां अब भी बनी हुई हैं।
हालांकि मौके पर बीट के फायर वाचर आग बुझाने की कोशिश करते हुए नजर आए और उन्होंने अपनी सीमित संसाधनों के बीच आग पर काबू पाने का प्रयास किया, लेकिन इस पूरी घटना के बीच एक अहम सवाल यह भी उठता है कि संबंधित बीट गार्ड की जिम्मेदारी आखिर कहाँ तक निभाई गई। जब जंगल की सुरक्षा की पहली पंक्ति ही कमजोर नजर आए, तो वन संरक्षण के दावे भी अधूरे प्रतीत होते हैं।
फिलहाल इस आगजनी से जंगल को कितना नुकसान हुआ और इसके पीछे की वास्तविक वजह क्या रही, यह जांच का विषय है। लेकिन इतना तय है कि यदि समय रहते ठोस और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो जंगलों की हरियाली और उनमें बसने वाले वन्यजीवों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है।
