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| सिर पकड़कर बैठा शख्स,हालात देखकर बंया करता तस्वीर |
स्टेट बैंक के सामने गंदगी, स्वच्छ भारत और अधिकारी मौन!
धरमजयगढ़। कभी शांत, सादगी और अपनत्व के लिए पहचाना जाने वाला धरमजयगढ़ आज अपने ही हालात पर मानो खुद सवाल कर रहा है। नगर के बीचों-बीच स्थित स्टेट बैंक ऑफ इंडिया शाखा के सामने पसरी गंदगी, सड़ांध मारता जलभराव और बदहाल सार्वजनिक शौचालय उस विकास की तस्वीर को चुनौती दे रहे हैं, जिसकी कल्पना “स्वच्छ भारत” के सपनों में की गई थी।
बता दें,बैंक जैसे सार्वजनिक और आवश्यक संस्थान के सामने महीनों से जमा गंदा पानी अब केवल असुविधा नहीं, बल्कि असुरक्षा और बीमारी का कारण बनता जा रहा है। बुजुर्गों के कांपते कदम, महिलाओं की असहजता और दिव्यांगजनों की विवशता इस दृश्य को और पीड़ादायक बना देती है। वहीं मुख्य द्वार के प्रायः बंद रहने से लोगों को कीचड़ और गंदगी से होकर गुजरना पड़ता है — मानो व्यवस्था ने सुविधा नहीं, संघर्ष का रास्ता तय कर दिया हो।
और वहीं सार्वजनिक शौचालय की दुर्दशा हालात की गंभीरता को और गहरा कर देती है। सफाई के अभाव में दुर्गंध चारों ओर फैलती है, जिससे आसपास का वातावरण दूषित हो रहा है। यह दृश्य न केवल प्रशासनिक लापरवाही की कहानी कहता है, बल्कि उस संवेदनहीनता को भी उजागर करता है, जहाँ योजनाएँ तो बनती हैं, पर ज़मीन पर उनका असर दिखाई नहीं देता।
वहीं स्थानीय लोगों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस समस्या को कई बार उठाया, शिकायतें भी कीं, पर हालात जस के तस हैं। लोगों के मन में अब यही प्रश्न गूंज रहा है — क्या स्वच्छता केवल नारों और दीवारों तक सीमित रह गई है? क्या जिम्मेदार विभागों की चुप्पी ही इस गंदगी की सबसे बड़ी वजह बन गई है?
बहरहाल धरमजयगढ़ की यह तस्वीर केवल एक स्थान की समस्या नहीं, बल्कि उस सोच का आईना है जहाँ जिम्मेदारी से अधिक औपचारिकता रह गई है। अब देखना यह है कि प्रशासन इस पीड़ा को सुनता है या यह पुकार भी समय की भीड़ में खो जाती है।
