भ्रष्टाचार की हदें पार,सिस्टम फेल या मिलीभगत? उपार्जन केंद्रों में धान घोटाले का बड़ा सवाल..!

 अन्य जिलों का धान भी खपा? अधिग्रहित जमीन पर भी बिक गया धान, धरमजयगढ़ में भ्रष्टाचार की हद पार!

धरमजयगढ़। एक ओर किसान अपना धान नहीं बिकने की पीड़ा लेकर हाईकोर्ट की शरण में पहुंच रहे हैं और न्याय की गुहार लगा रहे हैं, तो दूसरी ओर सरकारी तंत्र की जमीनी हकीकत पूरी व्यवस्था पर सवालों की बौछार कर रही है। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट बिलासपुर ने सक्ती जिला प्रशासन और सहकारी समिति को स्पष्ट निर्देश देते हुए किसान का शेष 84 क्विंटल धान 30 दिनों के भीतर खरीदने का आदेश दिया है। वहीं न्यायालय की सख्त टिप्पणी रही कि नियमों की आड़ में किसी भी किसान का नुकसान स्वीकार्य नहीं होगा। लेकिन धरमजयगढ़ क्षेत्र में सामने आ रही तस्वीर इस आदेश के ठीक विपरीत नजर आती है। यहां के धान उपार्जन केंद्रों में खरीदी व्यवस्था को लेकर ऐसे चौंकाने वाले खुलासे हो रहे हैं, जिन्होंने पूरी प्रणाली की पारदर्शिता को कठघरे में खड़ा कर दिया है। बता दें,प्रमाणित दस्तावेज अनुसार है, कि अधिकारियों और कर्मचारियों की कथित मिलीभगत से धान खरीदी प्रक्रिया में बड़े पैमाने पर अनियमितताओं को अंजाम दिया गया, जिसमें बिचौलियों का संगठित नेटवर्क सक्रिय भूमिका निभाता रहा।

वहीं सूत्रों के अनुसार, इस पूरे खेल की बुनियाद फर्जी किसान पंजीयन पर टिकी हुई है। और वहीं जाली दस्तावेजों और संदिग्ध तरीकों से पंजीयन कराकर सैकड़ों क्विंटल धान उपार्जन केंद्रों में खपाया गया। यह केवल सरकारी व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह नहीं है, बल्कि असली किसानों के अधिकारों पर सीधा प्रहार है। वहीं मिली दस्तावेज जानकारी अनुसार मामले की गंभीरता तब और बढ़ जाती है जब यह तथ्य सामने आता है कि जिन जमीनों का वर्षों पहले भारतीय रेलवे परियोजना के लिए अधिग्रहण हो चुका है, उन्हीं के रिकॉर्ड के आधार पर किसान पंजीयन कर धान की बिक्री कर दी गई। अधिग्रहित भूमि के नाम पर धान बिकना यह संकेत देता है कि निगरानी तंत्र या तो पूरी तरह निष्क्रिय रहा या फिर पर्दे के पीछे कोई बड़ा खेल संचालित होता रहा।

बता दें,धरमजयगढ़ के धान उपार्जन केंद्रों को लेकर स्थानीय स्तर पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि यहां बिचौलियों का जाल इस कदर फैला हुआ है कि फर्जी पंजीयन और संदिग्ध दस्तावेजों के सहारे खरीदी प्रक्रिया को लगातार प्रभावित किया जाता रहा है। चौंकाने वाली बात यह भी है कि कई असली भू-स्वामियों को इस बात की भनक तक नहीं लगी कि उनके नाम पर पंजीयन कर धान बेच दिया गया।

यही नहीं, अब एक और बड़े खुलासे की आहट है,सूत्र बताते हैं कि धरमजयगढ़ के उपार्जन केंद्रों में अन्य जिलों का धान भी खपाया गया है। यदि यह सच साबित होता है, तो यह घोटाला केवल स्थानीय नहीं, बल्कि अंतर-जिला स्तर की संगठित अनियमितता का रूप ले सकता है। वहीं सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब राज्य सरकार ने अवैध धान खरीदी पर अंकुश लगाने के लिए सख्त नियम बनाए, ब्लॉक और जिला स्तर पर नोडल अधिकारियों सहित विभिन्न विभागों के कर्मचारियों की ड्यूटी लगाई गई, तब भी इतनी बड़ी लापरवाही कैसे हो गई? क्या यह केवल सिस्टम की विफलता है, या फिर मिलीभगत का सुनियोजित खेल?बहरहाल अगर अब पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच हो, तो सच्चाई सामने आ सकेगी और असली किसानों को उनका हक मिल सकेगा

Post a Comment

Previous Post Next Post