क्रोंधा के जंगलों में नियमों की धज्जियां, क्रोंधा बीट में पोकलेन–ट्रकों की बेलगाम एंट्री, सांठगांठ के आरोप!


धरमजयगढ़़।
धरमजयगढ़़ वनमंडल के अंतर्गत वनपरिक्षेत्र धरमजयगढ़़ में इन दिनों हालात ऐसे बनते जा रहे हैं कि जिन पर वनों की सुरक्षा का जिम्मा है, वही रक्षक कम और भक्षक अधिक नजर आने लगे हैं। वन कानून–कायदों को ताक पर रखकर कथित सांठगांठ के जरिए जेब गर्म करने का खेल खुलेआम चलता दिख रहा है, जिससे वन संपदा को गंभीर क्षति पहुंच रही है।

पोकलेन मशीन द्वारा खोदाई स्थल 
मामला वनपरिक्षेत्र धरमजयगढ़़ के क्रोंधा बीट क्षेत्र का है, जहां क्रोंधा गांव से सेमीपाली गांव तक मुख्यमंत्री सड़क योजना के तहत सड़क निर्माण कार्य जारी है। आरोप है कि इस सड़क निर्माण के लिए आवश्यक मिट्टी–मुरूम की आपूर्ति सीधे क्रोंधा बीट क्षेत्र के जंगलों से की जा रही है। प्रतिदिन पांच से छह ट्रक जंगल के भीतर प्रवेश कर मिट्टी लोड कर सड़क निर्माण स्थल तक पहुंचा रहे हैं। हैरत की बात यह है कि जंगल में मिट्टी खुदाई के लिए पोकलेन जैसी भारी मशीनों का धड़ल्ले से उपयोग किया जा रहा है।


वहीं वन कानूनों की बात करें तो स्थिति बेहद गंभीर है। भारतीय वन अधिनियम, 1927 के तहत आरक्षित या संरक्षित वन क्षेत्र में बिना अनुमति किसी भी प्रकार का उत्खनन, खुदाई अथवा मशीनरी का प्रयोग अपराध की श्रेणी में आता है। वहीं वन (संरक्षण) अधिनियम, 1980 स्पष्ट करता है कि वन भूमि का गैर-वन उपयोग—जैसे सड़क निर्माण, खनन या भारी मशीनों का संचालन—केंद्र सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 और पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत भी बिना पर्यावरणीय स्वीकृति पोकलेन अथवा चेन माउंटेन मशीन से खुदाई करना गंभीर अपराध माना जाता है। लेकिन संबंधित बीट गार्ड को या तो वन अधिनियम की जानकारी नहीं है,या सीधे तौर पर कहें तो लापरवाह,या फिर वनरक्षक के आड़ में भक्षक बने बैठे हैं।

वहीं जब इस पूरे मामले में संबंधित बीट गार्ड रामेश्वर सिदार से जानकारी ली गई, तो उन्होंने यह कहकर पल्ला झाड़ने का प्रयास किया कि मिट्टी राजस्व विभाग की भूमि से उठाई जा रही है। लेकिन हमने आगे जब उनसे यह सवाल किया गया कि जंगल के भीतर भारी ट्रकों और पोकलेन मशीनों को किसकी अनुमति से प्रवेश दिया गया, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह रास्ता ग्रामीणों द्वारा भैंसागाड़ी चलाने के लिए बनाया गया था। उनके इस कथन से न केवल संदेह और गहराया, बल्कि यह आशंका भी जन्म लेने लगी कि कहीं इसी बहाने अवैध गतिविधियों को मौन संरक्षण तो नहीं दिया जा रहा।

और मामले की गंभीरता को देखते हुए जब वनपरिक्षेत्र सहायक डी.पी. सोनवानी से फोन पर संपर्क किया गया, तो उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि बिना वनविभाग की अनुमति के किसी भी प्रकार की बड़ी गाड़ियों या मशीनों का जंगल में प्रवेश पूरी तरह अवैध है। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस संबंध में कोई अनुमति जारी नहीं की गई है और प्रकरण की त्वरित जांच कर आवश्यक कार्रवाई की जाएगी।


और इधर सड़क निर्माण कार्य भी सवालों के घेरे में है। मुख्यमंत्री सड़क योजना के तहत हो रहे इस निर्माण का कार्य सुनील कुमार अग्रवाल कंस्ट्रक्शन द्वारा किया जा रहा है। आरोप है कि निर्माण स्थल पर न तो कहीं सूचना बोर्ड लगाया गया है और न ही लागत, लंबाई या योजना की स्पष्ट जानकारी उपलब्ध है। धूल नियंत्रण के लिए पानी का छिड़काव केवल औपचारिकता तक सीमित है, जबकि रोड रोलर भी सूखी मिट्टी पर दिखावे के लिए चलाया जा रहा है। घटिया गुणवत्ता की मुरूम—जो जंगल की उपजाऊ मिट्टी जैसी प्रतीत होती है—सड़क पर डाली जा रही है। न तो गुणवत्ता जांच अधिकारियों की नियमित उपस्थिति दिखती है और न ही वरिष्ठ अधिकारियों की निगरानी।

इन तमाम हालातों को देखकर यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या यह सब महज लापरवाही है, या फिर नियमों को ताक पर रखकर सांठगांठ से मालामाल होने की सुनियोजित कोशिश? अब देखना यह होगा कि वनविभाग की घोषित जांच केवल कागजी कार्रवाई बनकर रह जाती है, या फिर जंगल और कानून—दोनों को उनका हक दिलाने के लिए ठोस कदम उठाए जाते हैं।

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