कौन डकार रहा गरीबों का हक,धरमजयगढ़ में सिस्टम फेल या खेल?

धरमजयगढ़। विकास के दावों और जनकल्याणकारी योजनाओं की चमकती तस्वीरों के पीछे एक कड़वी सच्चाई धुंध की तरह पसरी हुई है। धरमजयगढ़ क्षेत्र में सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS) की हालत ऐसी हो चली है कि गरीबों की थाली तक पहुँचने से पहले ही उनका हक कहीं रास्ते में दम तोड़ देता है। वहीं ग्रामीण अंचलों से लगातार मिल रही शिकायतें अब केवल फुसफुसाहट नहीं रहीं, बल्कि एक सामूहिक आक्रोश का रूप लेती जा रही हैं। ग्रामीण हितग्राहियों से मिली जानकारी अनुसार आरोप है कि जनवरी 2026 माह का राशन कई दुकानों से आज तक वितरित नहीं हुआ। जिन दुकानों में राशन मिला भी, वहाँ चना नदारद रहा, जबकि ग्रामीणों के अनुसार चना स्टॉक में पहुँच चुका था। सवाल सीधा है—जब अनाज आया, तो गया कहाँ? यह केवल अनियमितता नहीं, बल्कि गरीबों की थाली से निवाला छीनने जैसा गंभीर मामला प्रतीत होता है। लेकिन वहीं मजदूरी पर निर्भर परिवारों की आर्थिक स्थिति पहले ही डांवाडोल है, ऐसे में राशन वितरण में इस तरह की कथित गड़बड़ियाँ उनके जीवन पर सीधा प्रहार हैं। और ग्रामीणों का कहना है कि उन्होंने कई बार स्थानीय प्रशासन और मीडिया के समक्ष शिकायतें रखीं, लेकिन परिणाम सिफर रहा। आरोप यह भी है कि स्थानीय खाद्य अधिकारी का रवैया उदासीन बना हुआ है और शिकायतों पर अपेक्षित कार्रवाई नहीं हो पा रही। वहीं कुछ राशन संचालकों पर पूर्व में कार्रवाई कर उन्हें जेल तक भेजा जाना विभाग की सख्ती का संकेत जरूर था, लेकिन ग्रामीणों का दावा है कि कई अन्य मामलों में कलेक्टर स्तर से निर्देश होने के बावजूद जमीनी अमल दिखाई नहीं दे रहा। बता दें बीते दिनों इसी तरह के मामले को लेकर ग्राम पंचायत विजयनगर के दौरे के दौरान जनपद पंचायत उपाध्यक्ष व अधिकारियों ने राशन संचालक को बदलने तक और वितरण सुधारने के निर्देश दिए थे, परंतु ग्रामीणों के अनुसार स्थिति जस की तस बनी हुई है। आदेश कागज़ों में सीमित रह जाएँ और भूख ज़मीन पर तड़पती रहे—यह विरोधाभास व्यवस्था की संवेदनहीनता पर कठोर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

बहरहाल छत्तीसगढ़ सरकार भले ही योजनाओं के माध्यम से अंतिम व्यक्ति तक लाभ पहुँचाने की बात करती हो, पर धरमजयगढ़ के अनेक गांवों की तस्वीर इन दावों से मेल नहीं खाती। यहाँ “राशन दुकान” कई हितग्राहियों के लिए अधिकार का केंद्र नहीं, बल्कि प्रतीक्षा और निराशा का प्रतीक बनती जा रही है। यह मामला केवल वितरण में लापरवाही का नहीं, बल्कि विश्वास के क्षरण का है। जब शिकायतें दर्ज हों, जाँच के आश्वासन मिलें, और फिर भी थाली खाली रह जाए—तो जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर जवाबदेही किसकी है?

फिलहाल धरमजयगढ़ की यह स्थिति पूरे प्रदेश की तस्वीर नहीं हो सकती, लेकिन यह एक ऐसा आईना जरूर है जिसमें व्यवस्था को अपना चेहरा देखना होगा। क्योंकि जब सरकार के राशन गोदाम भरे हों और पेट खाली—तो समस्या अनाज की नहीं, नीयत और निगरानी की होती है।

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