विकास की राह पर बिरहोर समाज, सुविधाएं मिलीं पर सवाल बाकी,सरकारी योजनाओं से बदली तस्वीर, चिखलापानी बना बदलाव की मिसाल, लेकिन लोकार्पण के बाद भी बहुउद्देशीय केंद्र अब भी बंद... पढ़िए पूरी खबर..!

 




झाला-झोपड़ी से पक्के आशियाने तक , चिखलापानी के बिरहोरों की बदली तस्वीर, फिर भी कुछ उम्मीदें बाकी...

धरमजयगढ़। कभी घने जंगलों और पहाड़ियों की गोद में झाला-झोपड़ी बनाकर जीवन बिताने वाले विशेष पिछड़ी जनजाति बिरहोर समुदाय के लोगों के जीवन में अब परिवर्तन की नई कहानी लिखी जा रही है। बता दें,धरमजयगढ़ जनपद पंचायत क्षेत्र अंतर्गत ग्राम पंचायत कुम्हीचुंआ के आश्रित ग्राम चिखलापानी में आज विकास की कई किरणें पहुंच चुकी हैं। पक्के मकान, पक्की सड़क, पेयजल के लिए बोरवेल, आंगनबाड़ी केंद्र और बिजली की सुविधा ने यहां के जनजीवन को नई दिशा दी है।


वहीं चिखलापानी, बिरहोर समुदाय की बसाहट के रूप में अपनी अलग पहचान रखता है। गांव निवासी  राजेश बिरहोर  बताया कि यहां लगभग  36 परिवारों के 115 से अधिक सदस्य  निवासरत हैं। शासन की विभिन्न जनकल्याणकारी योजनाओं का लाभ अब गांव तक पहुंच रहा है, जिससे लोगों के जीवन स्तर में उल्लेखनीय सुधार देखने को मिल रहा है।

आगे राजेश बिरहोर ने बताया कि एक समय था जब उनका समुदाय जंगलों और पहाड़ों में अस्थायी झोपड़ियां बनाकर रहता था। आज प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत मिले पक्के घरों में परिवार सुरक्षित और सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं। वे कहते हैं कि पहले जीवनयापन का प्रमुख आधार जंगलों से प्राप्त संसाधन थे। शिकार करना, सूखी लकड़ी, मोहलान की रस्सी तथा तेंदू फल एकत्र कर गांव-गांव जाकर बेचना ही आजीविका का साधन हुआ करता था। लेकिन समय के साथ सोच और जीवनशैली दोनों में बदलाव आया है।अब बिरहोर समुदाय शिक्षा के महत्व को समझने लगा है। गांव में आंगनबाड़ी केंद्र संचालित है और समीप स्थित प्राथमिक विद्यालय में बच्चे नियमित रूप से अध्ययन के लिए जाते हैं। सड़क, पेयजल और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं ने गांव को विकास की मुख्यधारा से जोड़ने का कार्य किया है।

हालांकि विकास की इस यात्रा के बीच ग्रामीणों की कुछ अपेक्षाएं अभी भी अधूरी हैं। राजेश बिरहोर का कहना है कि घरों तक बिजली तो पहुंच गई है, लेकिन गलियों में स्ट्रीट लाइट नहीं होने से रात के समय सांप-बिच्छुओं का भय बना रहता है। यदि बिजली खंभों पर प्रकाश व्यवस्था कर दी जाए तो ग्रामीणों को काफी राहत मिलेगी। इसके अलावा गांव में एक सामुदायिक मंच के निर्माण की मांग भी उन्होंने रखी, जिससे सामाजिक और सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए उचित स्थान उपलब्ध हो सके।वहीं अन्य ग्रामीणों ने यह भी बताया कि  पी.एम. जनमन योजना  के अंतर्गत आदिम जाति एवं अनुसूचित जाति विकास विभाग द्वारा बहुउद्देशीय केंद्र का निर्माण कराया गया है। और वहीं केंद्र का लोकार्पण भी हो चुका है, किंतु आज तक इसका संचालन शुरू नहीं हो पाया है। परिणामस्वरूप जिस उद्देश्य से यह भवन बनाया गया था, उसका लाभ बिरहोर समुदाय को नहीं मिल रहा है।

राजेश बिरहोर,चिखलापानी

और वहीं राजेश बिरहोर ने एक पुरानी पीड़ा भी साझा की। उन्होंने बताया कि जब उनका प्रधानमंत्री आवास निर्माण के दौरान पूरे परिवार ने श्रम किया था और उन्हें बताया गया था कि मनरेगा योजना के अंतर्गत मजदूरी राशि प्राप्त होगी। किंतु आज तक वह भुगतान नहीं मिला। इसके बावजूद वे कहते हैं कि वर्तमान समय में गांव की स्थिति पहले की तुलना में कहीं अधिक बेहतर हुई है और शासन द्वारा किए गए विकास कार्यों से वे संतुष्ट हैं।


बहरहाल, चिखलापानी की तस्वीर यह बताती है कि विकास की योजनाओं ने बिरहोर समुदाय के जीवन में सकारात्मक बदलाव लाया है। फिर भी कुछ अधूरे मकान, खंडहर में तब्दील होते आवास और बंद पड़े बहुउद्देशीय केंद्र यह संकेत देते हैं कि विकास की यह यात्रा अभी पूरी नहीं हुई है। यदि शेष आवश्यकताओं पर भी ध्यान दिया जाए, तो चिखलापानी न केवल बिरहोर समुदाय के उत्थान का उदाहरण बनेगा, बल्कि जनजातीय विकास की एक प्रेरक मिसाल के रूप में भी उभरेगा। फिलहाल संबंधित विभागीय आला अधिकारी विकास कार्यों को लेकर लगातार जुटे हुए हैं, और शेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, विकास की यात्रा प्रगतिशील बनाए हुए हैं।


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