धरमजयगढ़़,रायगढ़। जिले में अवैध कोयला खनन को लेकर एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने प्रशासनिक कार्यप्रणाली और विभागीय समन्वय पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। यह मामला केवल एक मशीन की रिहाई तक सीमित नहीं है, बल्कि उन दोहरे मानदंडों की ओर भी इशारा करता है, जिनमें छोटे वाहन संचालकों पर सख्ती दिखाई जाती है, जबकि प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों में नियमों की व्याख्या अलग ढंग से होती दिखाई देती है। धरमजयगढ़-घरघोड़ा क्षेत्र के जंगलों में लंबे समय से अवैध कोयला खनन की शिकायतें सामने आती रही हैं। इसी क्रम में फरवरी माह में बोरो क्षेत्र में नदी किनारे अवैध कोयला उत्खनन करते हुए संयुक्त टीम ने एक चेन माउंटेन मशीन को जब्त किया था। मौके से लगभग 40 टन कोयला भी बरामद हुआ था। प्रारंभिक जांच में आशंका जताई गई कि खनन वन भूमि पर किया जा रहा है, जिसके चलते प्रकरण की पुष्टि के लिए फाइल वन विभाग को भेजी गई। वहीं खनिज विभाग की अपेक्षा थी कि वन विभाग केवल यह स्पष्ट करेगा कि संबंधित भूमि वन क्षेत्र के अंतर्गत आती है या नहीं। यदि भूमि वन क्षेत्र होती तो वन विभाग अपने स्तर पर कार्रवाई कर प्रकरण आगे बढ़ाता, और यदि वन भूमि नहीं होती तो फाइल खनिज विभाग को लौटाई जाती। किंतु घटनाक्रम ने अप्रत्याशित मोड़ ले लिया। बताया जा रहा है कि वन विभाग ने संबंधित स्थल को वन भूमि नहीं मानते हुए वाहन स्वामी को क्लीन चिट प्रदान कर दी और जब्त चेन माउंटेन मशीन को भी मुक्त कर दिया। यहीं से पूरे मामले ने विवाद का रूप ले लिया, क्योंकि खनिज विभाग की ओर से अब तक निर्धारित की गई पेनाल्टी जमा नहीं कराई गई थी।
साढ़े आठ लाख की पेनाल्टी, लेकिन वाहन गायब
खनिज विभाग ने जब्त कोयले का ग्रेड परीक्षण कराया, जिसमें कोयला जी-5 ग्रेड का पाया गया। इसके आधार पर विभाग ने लगभग साढ़े आठ लाख रुपये की पेनाल्टी निर्धारित की। जिला खनिज कार्यालय के अनुसार अवैध खनन का प्रकरण दर्ज कर जुर्माना लगाया जा चुका है, लेकिन वाहन स्वामी अब विभाग की पहुंच से बाहर बताया जा रहा है। और वहीं स्थिति यह है कि जिस मशीन पर अवैध कोयला खनन का आरोप है, वह बिना जुर्माना अदा किए मुक्त हो गई और अब विभाग उसके मालिक की तलाश कर रहा है। इससे यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि जब रेत परिवहन में पकड़े गए ट्रैक्टरों को पेनाल्टी जमा होने तक हफ्तों खड़ा रखा जाता है, तब इस मामले में इतनी उदारता क्यों बरती गई?
वन विभाग की भूमिका पर उठे सवाल?
वहीं जानकारों का कहना है कि वन विभाग को केवल भूमि की स्थिति स्पष्ट करनी थी, लेकिन विभाग ने स्वयं निर्णय लेते हुए वाहन को मुक्त कर दिया। इस कार्रवाई ने प्रशासनिक प्रक्रिया और अधिकार क्षेत्र को लेकर भी बहस छेड़ दी है। क्षेत्र में यह चर्चा भी जोर पकड़ रही है कि जहां कोयला निकाला जा रहा था, वहां कोल सीम के ऊपर ओवरबर्डन की परत अत्यंत कम थी, जिसके कारण चेन माउंटेन मशीन के माध्यम से आसानी से कोयला निकाला जा रहा था। स्थानीय लोगों का दावा है कि वहां कई दिनों से खनन गतिविधियां संचालित हो रही थीं। वहीं मामले में जितेंद्र उपाध्याय, डीएफओ, धरमजयगढ़ ने कहा कि वह अपने अधीनस्थ अधिकारियों से जानकारी प्राप्त करेंगे और फाइल देखने के बाद ही इस संबंध में कोई स्पष्ट टिप्पणी कर पाएंगे।
वहीं रमाकांत सोनी, जिला खनिज अधिकारी, रायगढ़ का कहना है कि अवैध कोयला खनन गंभीर अपराध है। विभाग ने प्रकरण दर्ज कर लगभग साढ़े आठ लाख रुपये की पेनाल्टी निर्धारित की है।
बड़ा सवाल - इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि क्या जिले में अवैध कोयला खनन करने वालों को संरक्षण मिल रहा है? यदि नहीं, तो बिना पेनाल्टी जमा हुए जब्त मशीन कैसे मुक्त हो गई? और यदि पेनाल्टी निर्धारित हो चुकी थी, तो उसकी वसूली सुनिश्चित किए बिना वाहन को छोड़े जाने की जिम्मेदारी किसकी है? इन सवालों के जवाब प्रशासनिक जांच और विभागीय पारदर्शिता से ही सामने आ सकेंगे, लेकिन फिलहाल यह मामला रायगढ़ में अवैध खनन और प्रशासनिक व्यवस्था पर एक गहरी बहस को जन्म दे चुका है।
